वामन देव और तीन प्यार भरे कदम
जानिए कैसे लकड़ी का छोटा-सा छाता लिए एक नन्हें बालक ने एक महान राजा को सिखाया कि असली महानता विनम्रता और अपना वचन निभाने में है।
एक समय की बात है, बालि नाम के एक राजा थे जो हर किसी को उपहार देना बहुत पसंद करते थे। राजा बालि को इस बात का बहुत घमंड था कि कोई भी उनके महल से कभी खाली हाथ नहीं लौटता। एक सुहावनी सुबह, वामन नाम का एक प्यारा-सा नन्हा बालक महल में आया। वामन के हाथ में एक छोटी-सी लकड़ी की छतरी थी और उनके चेहरे पर एक शांत-सी मुस्कान थी।
राजा बालि ने नन्हें वामन का खुशी-खुशी स्वागत किया और कहा, 'छोटे बालक, तुम जो चाहो माँग लो! हीरे-जवाहरात, ज़मीन या फिर पूरा का पूरा शहर!' वामन ने धीरे से अपना सिर हिलाया और मुस्कुराए। वामन ने मीठी आवाज़ में कहा, 'मुझे चमकीले ख़ज़ाने नहीं चाहिए। मैं तो बस उतनी-सी ज़मीन माँगता हूँ जितनी मैं अपने तीन छोटे कदमों से नाप सकूँ।'
राजा बालि ज़ोर से हँस पड़े, यह सोचकर कि यह तो कितना छोटा-सा उपहार है। 'मैं तुम्हें तुम्हारे तीन कदम देता हूँ!' राजा ने वचन दे दिया। लेकिन जैसे ही राजा ने यह कहा, वामन बड़े होने लगे! वे पेड़ों से भी बड़े, पहाड़ों से भी ऊँचे और रुई जैसे सफ़ेद बादलों के पार पहुँच गए।
अपने पहले ही विशाल कदम से बड़े वामन ने पूरी हरी-भरी धरती को नाप लिया! अपने दूसरे विशाल कदम से उन्होंने पूरा नीला आकाश और तारों भरा ब्रह्मांड नाप लिया। वामन ने प्यार से नीचे देखा और पूछा, 'अब मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ?'
राजा बालि ने बहुत प्रेम और विनम्रता से अपना सिर झुका लिया। वे समझ गए थे कि नन्हें वामन कितने खास थे। बालि ने धीरे से कहा, 'कृपया अपना तीसरा कदम मेरे सिर पर रख दीजिए।' वामन ने प्यार से अपना पैर राजा के सिर पर रखा और उनके सच्चे मन और बड़े दिल के लिए उन्हें आशीर्वाद दिया। सबने उस दयालु राजा की जय-जयकार की, जिसने सीखा कि प्यार और विनम्रता ही सबसे बड़ा ख़ज़ाना है।
असली ताकत इस बात में नहीं है कि हमारे पास कितना सामान है, बल्कि इसमें है कि हमारा दिल कितना विनम्र और उदार है।
इस कहानी के बारे में
स्रोतः: श्रीमद्भागवत पुराण की कथा पर आधारित