कृष्ण और मोरपंख

कृष्ण बालों में पंख क्यों पहनते हैं — बिना माँगे दिया गया एक छोटा-सा धन्यवाद।

आयु 3-4 2 मिनट

हर शाम, जब सूरज नदी के ऊपर ढलकर नारंगी हो जाता, कृष्ण अपनी पसंदीदा चट्टान पर बैठ जाते और बाँसुरी बजाते। वे किसी के लिए नहीं बजाते थे। शाम थी, पानी था, और बाँसुरी हाथ में थी — इसलिए बजाते थे। पर नदी सुनने के लिए धीमी हो जाती। गायें चरना छोड़ देतीं। और पूरा वन चुप हो जाता।

एक शाम, पेड़ों के बीच कुछ हिला। एक मोर निकला। फिर दूसरा। फिर तीसरा — घास में बहुत सँभलकर पैर रखते हुए, जैसे मोर रखते हैं, मानो ज़मीन गीली हो। वे पास नहीं आए। पेड़ों के किनारे सिर टेढ़ा किए खड़े रहे, और सुनते रहे।

फिर सबसे बड़े मोर ने वह किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उसने अपने पंख खोल दिए। एक ही पल में वे उसके पीछे नीले-हरे बड़े पंखे की तरह उठ गए, ढलते सूरज में सैकड़ों आँखें चमक उठीं — और वह नाचने लगा। गोल-गोल, पंजों पर उठकर, संगीत की ताल पर घास में घूमते हुए। कृष्ण हँसे और बजाते रहे, मोर नाचता रहा, जब तक सूरज लगभग डूब न गया।

आख़िरी सुर मिटा, तो मोर रुक गया। वह चट्टान तक आया, सिर झुकाया, और अपना एक लंबा पंख कृष्ण के पैरों के पास घास पर गिरने दिया। फिर वह पीछे हट गया। उसे कुछ नहीं चाहिए था। वह बस संगीत के लिए धन्यवाद था।

कृष्ण ने उसे उठाकर हाथ में घुमाया। वह एक साथ नीला, हरा और सुनहरा था। उन्होंने उसे किसी डिब्बे में नहीं रखा। सीधे अपने बालों में खोंस लिया, जहाँ सब देख सकें। और तब से वे उसे पहने हुए हैं। उनका कोई भी चित्र देखो — इसी किताब में, किसी मंदिर में, कहीं भी — वहाँ वही एक पंख होगा, आज भी धन्यवाद कहता हुआ।

कोई तुम्हें कुछ छोटा-सा दे, तो उसे वहाँ रखो जहाँ वह दिखता रहे।

इस कहानी के बारे में

स्रोत: ब्रज परंपरा की व्यापक रूप से कही जाने वाली वैष्णव लोककथा, जो बताती है कि कृष्ण अपने बालों में मोरपंख क्यों पहनते हैं। यह कोई एक पौराणिक प्रसंग नहीं है; यहाँ छोटे बच्चों को सुनाया जाने वाला कोमल रूप लिया गया है, जिसमें पंख दिया जाता है, छीना नहीं जाता।

कृष्ण कृतज्ञतादयालुता आयु 3-4 2 मिनट

समापन श्लोक

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane, praṇatakleśanāśāya govindāya namo namaḥ
वसुदेव के पुत्र कृष्ण को, हरि को, परमात्मा को, शरण में आने वालों के दुःख हरने वाले को — गोविंद को बार-बार नमस्कार।