लक्ष्मी और मिट्टी का दीया

एक छोटा दीया, एक अँधेरी गली — और रोशनी बाँटने पर उसका क्या होता है।

आयु 3-4 1 मिनट

वह दीयों की रात थी। लक्ष्मी ने आकाश से नीचे देखा। उन्हें यह रात सबसे प्यारी लगती थी। पर एक छोटी गली अँधेरी थी। एक भी दीया नहीं। एक भी रोशनी नहीं।

उसी गली में आशा नाम की एक लड़की रहती थी। आशा के पास एक मिट्टी का दीया था। बस एक। उसने उसे जलाया और अपनी देहरी पर रख दिया। उससे रोशनी का एक छोटा गरम घेरा बन गया।

पड़ोस में बूढ़ी नानी के पास कोई रोशनी नहीं थी। आशा ने अपने इकलौते छोटे दीये को देखा। "आइए," उसने कहा। उसने अपनी लौ नानी के दीये से छुआ दी। अब दो रोशनियाँ थीं। और आशा का दीया पहले जितना ही चमकीला था।

नानी ने अपनी रोशनी पड़ोस के लड़के को दी। लड़के ने अपनी रोशनी नानबाई को दी। नानबाई ने अपनी कुम्हार को दी। रोशनी, और रोशनी, और और रोशनी — पूरी गली भर।

लक्ष्मी देखने नीचे आईं। वे गरम और जगमगाती गली में चलीं। हर दरवाज़े पर वे मुस्कुराईं। "रोशनी बाँटने से छोटी नहीं होती," उन्होंने कहा। "वह तो बस और फैल जाती है।"

बाँटने से रोशनी छोटी नहीं होती। वह बस और फैल जाती है।

इस कहानी के बारे में

यह बालकथा की मौलिक कहानी है, इन देवता के मूल्यों के अनुरूप लिखी गई।

लक्ष्मी बाँटनादयालुताकृतज्ञता आयु 3-4 1 मिनट

समापन श्लोक

महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं महालक्ष्मि नमो नमः । शरण्ये करुणामूर्ते नमस्ते भक्तवत्सले ॥
mahālakṣmi namastubhyaṃ mahālakṣmi namo namaḥ, śaraṇye karuṇāmūrte namaste bhaktavatsale
महालक्ष्मी, आपको नमस्कार; महालक्ष्मी, बार-बार नमस्कार। शरण देने वाली, करुणा की ही मूर्त रूप, भक्तों पर स्नेह रखने वाली — आपको नमस्कार।