कृष्ण और गोवर्धन पर्वत

जब एक भयंकर तूफ़ान ने पूरे गाँव को डरा दिया, तब नटखट कृष्ण ने सिर्फ़ अपनी एक उंगली पर पूरा पहाड़ उठा लिया।

आयु 3-4 3 मिनट

वृंदावन के हरे-भरे मीठे खेतों में, गाएँ गोवर्धन पर्वत के पास खुशी-खुशी चरती थीं। यह पर्वत उन्हें खाने को मीठी घास, पीने को ठंडा पानी और आराम करने के लिए छायादार पेड़ देता था। "देखो, यह पर्वत हमें हर रोज़ कितना कुछ देता है!" नन्हें कृष्ण ने एक प्यारी सी मुस्कान के साथ कहा। "हमें इस पर्वत का धन्यवाद करना चाहिए, जो हमारी प्यारी गायों का पेट भरता है!" सभी गाँव वालों ने खुशी से हाँ में सिर हिलाया और धन्यवाद के प्यारे-प्यारे गीत गाए।

आकाश में बहुत ऊँचे, राजा इंद्र नीचे देख रहे थे। उन्हें अपने आप पर बहुत घमंड था, और वे सोचते थे कि बारिश के लिए केवल उन्हीं का धन्यवाद होना चाहिए। "ये लोग मेरी जगह इस पर्वत का आदर कर रहे हैं!" इंद्र ने गुस्सा होकर कहा। उन्होंने हाथ हिलाया, और पूरे आसमान में काले-काले बादल छा गए। तेज़ हवा चलने लगी और पूरी घाटी पर मूसलाधार बारिश होने लगी।

बारिश और भी तेज़ होती गई। छोटे-छोटे बछड़े काँपने लगे, और गाँव वाले भागकर कृष्ण के पास आए। "चिंता मत करो," कृष्ण ने प्यार से कहा। "यह पर्वत ही हमारी रक्षा करेगा।" वे सीधे उस विशाल हरे पर्वत के पास गए, अपना बायाँ हाथ बढ़ाया, और अपनी छोटी उंगली की नोक पर पूरे पहाड़ को उठा लिया! उन्होंने पर्वत को ज़मीन से ऊपर ऐसे थामे रखा, जैसे कोई बहुत बड़ा हरा छाता हो।

"सब इसके नीचे आ जाओ!" कृष्ण ने हँसते हुए पुकारा। सभी माता-पिता, बच्चे और भोली-भाली गाएँ हवा में तैरते पर्वत के नीचे आ गईं। अंदर सब बहुत सुरक्षित, गरम और सूखा था। कृष्ण बीच में खड़े थे, और उन्होंने सात दिनों तक बिना किसी थकावट के अपनी एक छोटी उंगली पर विशाल पर्वत को सँभाले रखा, और सबको देखकर मुस्कुराते रहे। बाहर तूफ़ान पर्वत से टकराता रहा, लेकिन बारिश की एक भी बूँद गाँव वालों को छू तक न सकी।

आखिरकार, राजा इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने देखा कि घमंड ने उनकी आँखों पर पर्दा डाल दिया था, जबकि नन्हें कृष्ण की महान शक्ति उनके सच्चे प्रेम और सबके प्रति दुलार से आती थी। काले बादल हट गए, और खेतों में फिर से सुनहरी खिली-खिली धूप फैल गई। इंद्र नीचे आए और मुस्कुराते हुए नन्हें कृष्ण के आगे आदर से हाथ जोड़ लिए। और उस दिन के बाद से, सब जान गए कि दुनिया में सबसे बड़ी शक्ति वही है जो छोटों की रक्षा करती है।

सच्ची शक्ति हमेशा अपनों की रक्षा करती है, और घमंड सदा प्रेम के आगे झुक जाता है।

इस कहानी के बारे में

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध, अध्याय 24-27 — यह बालक कृष्ण द्वारा मूसलाधार बारिश से वृंदावन के लोगों और भोली गायों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने की पावन कथा है, जो हमें सिखाती है कि सच्ची महानता छोटों की रक्षा करने में है और घमंड हमेशा प्रेम में पिघल जाता है।

कृष्णइंद्र साहसविनम्रता आयु 3-4 3 मिनट

समापन श्लोक

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane, praṇatakleśanāśāya govindāya namo namaḥ
वसुदेव के पुत्र कृष्ण को, हरि को, परमात्मा को, शरण में आने वालों के दुःख हरने वाले को — गोविंद को बार-बार नमस्कार।