राहुल और पानी का कटोरा
जब छोटे राहुल ने एक नटखट झूठ बोला, तब भगवान बुद्ध ने पानी के कटोरे के ज़रिये उसे सच, दया और साफ़ दिल रखने की एक सुंदर सीख दी।
छोटे राहुल को बांस के शांत बगीचे में खेलना बहुत पसंद था। धूप भरी एक दोपहर, उसने मज़ाक-मज़ाक में कुछ आगंतुकों से एक छोटा सा शरारती झूठ बोल दिया। उसने सोचा कि ऐसे छोटे-मोटे मज़ाक से किसी का कोई नुकसान नहीं होता। ज्ञानी और दयालु बुद्ध ने यह देखा, और वे समझ गए कि अब राहुल को प्यार से एक सीख देने का समय आ गया है।
बुद्ध ने छोटे राहुल को अपने पास बुलाया और साफ़ पानी का एक कटोरा माँगा। राहुल तुरंत भागा और ठंडे, चमचमाते पानी से भरा लकड़ी का एक साधारण कटोरा ले आया। उसने उसे बड़े प्यार से अपने गुरु के चरणों में रख दिया। राहुल उत्सुक नज़रों से देखता रहा और बुद्ध ने ध्यान से अपने पैर धोए।
इसके बाद, बुद्ध ने कटोरे में बचे मटमैले पानी की ओर इशारा किया। उन्होंने राहुल से पूछा कि क्या अब कोई इस पानी को पीना चाहेगा? राहुल ने ना में सिर हिलाया और कहा कि यह तो गंदा हो चुका है। बुद्ध ने समझाया कि झूठ बोलने से हमारा दिल भी इस गंदे पानी की तरह मटमैला हो जाता है।
फिर, बुद्ध ने कटोरे को पूरा उलट दिया ताकि उसकी एक-एक बूंद बाहर गिर जाए। उन्होंने प्यार से कटोरे को उल्टा करके रख दिया। उन्होंने राहुल को बताया कि झूठ बोलने से हमारी अंदर की अच्छाई बाहर निकल जाती है और हमारा दिल इस उल्टे कटोरे की तरह खाली हो जाता है। राहुल ने ध्यान से बात सुनी और सच्चाई को समझ लिया।
अंत में, बुद्ध ने राहुल से कटोरे को वापस सीधा करने को कहा। राहुल ने उसे साफ़, चमचमाते पानी से भर दिया और हमेशा सच और मीठी बोली बोलने का वादा किया। बुद्ध मुस्कुराए और उन्होंने बड़े प्यार से राहुल के सिर पर हाथ रखा। गुनगुनी धूप में उन दोनों के दिल बहुत हल्के और शांत महसूस कर रहे थे।
सत्य बोलने से हमारा मन साफ़ पानी की तरह निर्मल, शांत और उज्ज्वल रहता है।
इस कहानी के बारे में
स्रोतः: अम्बलट्ठिक-राहुलोवाद सुत्त से पुनर्कथित।