सीता और नन्हे गुनगुनाते पौधे

जब जंगल के छोटे-छोटे पौधे धीरे-धीरे बढ़ने के कारण उदास हो जाते हैं, तब प्यारी सीता उन्हें धैर्य का जादुई उपहार सिखाती हैं। प्रकृति से प्यार करने और सही समय पर खिलने की एक प्यारी कहानी।

उम्र 5-7

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शांत और सुंदर जंगल के बगीचे में, प्यारी सीता लंबे पेड़ों और खिलते फूलों के बीच टहल रही थीं। जैसे ही वह नीचे झुकीं, उन्होंने देखा कि मुरझाई पत्तियों वाले तीन नन्हे-छोटे पौधे उदास पड़े थे। वे हल्की छांव में बहुत शांत और दुखी लग रहे थे। सीता उनके पास घुटनों के बल बैठ गईं और उनकी छोटी-सी कोपलों को देखकर प्यार से मुस्कुराईं।

सीता मुलायम भूरी मिट्टी के करीब झुकीं और ध्यान से सुनने लगीं। 'सर-सर, सर-सर,' पौधों ने बहुत धीरे से फुसफुसाया। वे इसलिए उदास थे क्योंकि वे बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहे थे! वे तुरंत बड़ी-बड़ी पत्तियों के साथ फलना-फूलना चाहते थे ताकि सोए हुए हिरणों और चहकती चिड़ियों को छांव दे सकें।

सीता ने अपनी अंजलि में ताज़ा पानी लिया और पौधों की जड़ों पर प्यार से छिड़क दिया। 'बड़ा होने में थोड़ा समय लगता है, मेरे प्यारे नन्हे-मुन्नों,' सीता ने बड़ी ममता से कहा। 'सबसे पहले, तुम्हारी जड़ों को धरती माँ के गहरे अंदर तक जाना होगा ताकि तुम मज़बूत बन सको। थोड़ा धैर्य रखो और मीठी बारिश पर भरोसा करो।'

दयालु राजकुमार राम मिट्टी के मटके में झरने का ठंडा पानी लेकर वहां आए। सीता और राम ने मिलकर उस नन्हे बगीचे के लिए एक मीठा-सा गाना गाया। उन्होंने पौधों को याद दिलाया कि जब प्यार से देखभाल की जाती है, तो प्रकृति का हर पौधा अपनी सही गति से खिलता है।

हर बीतते दिन के साथ, नन्हे पौधों ने सुनहरी धूप पी और थोड़े और बड़े हो गए। जल्द ही, उनकी हरी-भरी पत्तियाँ हवा में खुशी से झूमने लगीं! नन्हे पेड़ों ने मज़बूत और धैर्यवान बनने पर गर्व महसूस किया और सरसराकर सीता और राम को धन्यवाद का एक प्यारा गीत सुनाया।

बड़ी और अच्छी चीज़ें बनने में समय लगता है। प्यार और धैर्य से प्रकृति की हर चीज़ मुस्कुरा उठती है।

इस कहानी के बारे में

स्रोतः: रामायण की लोककथाओं से प्रेरित

sita उम्र 5-7

बंदना

जय सिया राम
jai siya ram

EnglishVictory to Sita and Rama, together always!

नेपालीसीता र रामको जय, सधैँ सँगै!

हिन्दीसीता और राम की जय, सदा साथ!

श्लोक

ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि । तन्नो सीता प्रचोदयात् ॥
oṃ janakanandinyai vidmahe bhūmijāyai dhīmahi, tanno sītā pracodayāt
जनक की पुत्री का हम ध्यान करते हैं, धरती से जन्मी को मन में धारण करते हैं; सीता हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।